संस्मरणात्मक उपन्यास ‘पिताजी और तारीख़’ में न्यायपालिका के साथ-साथ समाज के अन्य हिस्सों में व्याप्त जटिलताओं को सांकेतिक रूप से उजागर करने का छोटा-सा प्रयास हुआ है। हमारे देश में न्यायपालिका की जो स्थिति है वो पीड़ित वर्ग ही समझ सकता है। जिसे कभी अदालत जाने की आवश्यकता नहीं पड़ी वह समझ ही नहीं सकता कि तारीख़ क्यों पड़ती है नज़राना क्यों दिया जाता है या हाकिम किसे कहते हैं! देशभर में न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या रोज़ बढ़ती ही जा रही है। बमुश्किल एक मामले में फ़ैसला आता है तो 10 नए मुक़दमे दर्ज हो जाते हैं। बढ़ती सामाजिक जटिलताएँ कुटिलताएँ लोभ क्रोध इत्यादि विकृतियाँ ही तो बढ़ते हुए झगड़ों की वजह हैं जिनसे न्यायालयों में मुक़दमों का बोझ बढ़ रहा है। इस उपन्यास में यही चित्रित करने का प्रयास हुआ है कि निचली अदालतों में अधिवक्ताओं एवं मुवक्किलों की क्या स्थिति है कैसे उनका शोषण होता है कैसे क़ानून की उपलब्धता समर्थ वर्ग के लिए आसान होती है और कमज़ोर वर्ग के लिए कठिन! ये भी कि क़ानून की धाराओं का प्रयोग अलग-अलग समूह के लोगों के लिए अलग-अलग तरीक़े से किया जा सकता है। बस वो सामर्थ्य होनी चाहिए और सामर्थ्य का सीधा तात्पर्य आर्थिक क्षमता से है। तभी तो इस उपन्यास के लेखक कमलाकर मिश्रा अपनी काव्य-पंक्तियों में कहते हैं- अपराध (धाराएँ) बदलते देखा है/ फिर दंड बदलते देखा है/ औक़ात देख अपराधी की/ कानून बदलते देखा है...
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