जज्बाती हूँ। ये कहानियाँ नहीं बल्कि जिन्दगी में जिये गये जज्बात हैं। दिल के किसी कोने में ये ज़ज्बात ज़ब्ज़ होते रहते हैं। बाँध कितने ही मजबूत क्यों न हों बढ़ते पानी को रोके रखने में अंततः असमर्थ हो जाते हैं। यही हाल होता है ज़ज्बातों का। दिल भी आखिर कितने ज़ज्बातों को और कब तक संजो कर रख सकता है?