प्रताप सहगल एक विविधधर्मी रचनाकार हैं। आधुनिक हिन्दी साहित्य के एक प्रमुख हस्ताक्षर। उनकी मुख्य पहचान एक नाटककार के रूप में है। अन्वेषक रामानुजन और बुल्लेशाह जैसे नाटक एक नई नाट्य-परंपरा का निर्माण करते हैं। अन्वेषक और रामानुजन से विज्ञान-नाटकों की शुरुआत मानी जाती है। लेकिन साहित्य की लगभग सभी विधाओं में उनकी पहचान है। एक कवि के रूप में तो वे सुविख्यात हैं ही कथाकार और एक चिंतक का रूप भी रेखांकित करने योग्य है। उनके यात्रा-वृत्तांत पाठकों द्वारा बार-बार पढ़े और सराहे जाते हैं। बाल साहित्य में भी उनकी मज़बूत पकड़ है। ऐसे विविधधर्मी रचनाकार को ही यह पुस्तक रेखांकित करती है। उनके सम्पूर्ण साहित्य को हम एक पुस्तक में प्रकाशित कर भी नहीं सकते लेकिन कह सकते हैं कि यह किताब प्रताप सहगल के लेखन को समझने के लिए गागर में सागर का काम करती है। प्रताप सहगल न केवल हर विधा में लिखते हैं हर बार वे स्वयं को नए सिरे से अन्वेषित भी करते हैं। उनकी सभी कहानियों के कथ्य एक-दूसरे से अलग हैं। सभी नाटकों का संसार बहुत विशद है और भिन्न दृष्टिकोणों से वे अपने नाट्य-संसार का निर्माण करते हैं। इसीलिए इस पुस्तक की सम्पादक शशि सहगल लिखती हैं कि वे नित नए होते हैं। अपने साहित्य को भी नित नया करते रहते हैं। उनके नाटक देश भर में रंगमंच पर धूम मचाते रहते हैं। यह कहना ग़लत न होगा कि इस समय प्रताप सहगल सर्वाधिक मंचित होने वाले नाटककार हैं। विश्वविद्यालयों में उनके नाटक पढ़ाए जाते हैं। हाल ही में उनका नया नाटक कोई और रास्ता के मंचन ने कोलकाता के दर्शकों का दिल जीत लिया।