सच तो सच होता है। उसकी आंखें निकाल लो पांव काट दो हाथों में जजीरें पहना दो फिर भी वह सफे पर उग आएगा। डंके की चोट पर कहेगाµ फ्मैं जिंदा हूँ मैं जिंदा हूँ मैं जिंदा हूँ! झूठ के पांव नहीं होते वह टिक कर नहीं रह सकता। धरती की सतह उसके लिए किसी काम की चीज नहीं हवा के प्रदूषित झोंके ही उसके लिए काफी है। मेरी कहानियां झूठ के पांव या बिल्ली सरीखी दबे पांव कभी नहीं चली। कारण स्पष्ट है परिवेश वातावरण और लड़ते-मरते-जूझते समाज के लोग। सभी के सभी सांवले और कुम्हलाए लोग थके-मांदे और पसीना बहाते घूसर मिट्टी में लिपटे लोग। सबब था इनकी संघर्षरत जिंदगी में रंग भरने की कूची से नहीं बल्कि कलम से। एक चुनौती भरा काम। प्रतिभा से अधिक परिश्रम की मांग थी यहां। कठिन-कठोर गद्य की पहली मांग।-राना प्रताप