कितना सुंदर हो अगर तुलनाएँ छोड़ दी जाएँ मानक की मान्यताएँ तोड़ दी जाएँ कितना सुंदर हो अगर तुम्हारे चेहरे को कोई फूल या चाँद ना लिखे तुम्हारी आंखों को आँख ही कहा जाए तुम्हारे बाल ना बने घटाएँ तुम्हारे हाथ तुम्हारे हाथ हों ना समझे कोई उन्हें लताएँ विशेष को पूजनीय मानने के इस दौर में साधारण होने की कोशिश भी कठिन है फिर भी मैंने लिखनी चाही भारी रूपकों के बिना अनगढ़ छंदों में अलंकारों से मुक्त तीन अक्षरों की एक सरल सी कविता जिसमें केवल “मैं” “तुम” और “प्रेम” हों