एक ठहरे दिए की जलती निरन्तरता में मुझे प्रेमदीप मिला। प्रेम स्वास्थ्यवर्धक औषधि है। स्वस्थ मन ही बुद्धि और शरीर को सही राह दिखा सकता है। स्वस्थ प्रेमी सामाजिक विषमताओं से ऊपर उठता जाता है एक स्वस्थ समाज के अस्तित्व का आरम्भ यहीं है। मानसिक रूप से स्वस्थ और आत्मिक समृद्ध समाज ही देश के विकास की मूलभूत इकाई है। फ्रायड ने अभिव्यक्ति के उद्देश्य हेतु यौनकुंठा(लीविडो) को प्रतिष्ठापित किया। उनके सिद्धांत एक वर्ग का प्रतिनिधित्व कर सकते होंगे परन्तु भरतमुनि प्रणीत नाट्योद्देश्य व्यापक जनसमुदाय को आनन्दित करने हेतु है। दुखी-श्रमिक-अभिजात-स्त्री-पुरुष सबके आत्मिक आनन्द को अनुभूत कराना काव्य का लक्ष्य है। यहाँ कुंठा नहीं है काम जीवन-साधक पुरुषार्थ है और प्रेम उत्कर्षाधायक भाव है। सुगम राह है प्रेम... जिसे सभी तलाशते रहते हैं इधर-उधर। अनुभूतियों से ज्ञात यह भाव आत्मिक दर्शन है सत् स्वरूप है प्रकाश है आनन्दमय है। इन्हीं अनुभूतियों में मन की विचिकित्सा है बुद्धि निःकलुषित होती है और आत्मा तृप्त होती है। मानवीय अस्तित्व का आरम्भिक भाव है प्रेम जो अनादिकाल से अद्यतन रोमांचक है। सौंदर्यप्रसाधन मुस्कान सृजित करने में अक्षम हैं और प्रेमरस में अंतस्थल गुदगुदा जाता है। ईर्ष्या द्वेष लाभहानि बहुत पीछे छूटते जाते हैं। बस बहुत अच्छा-सा लगता है तभी तो यह आत्मिक आनन्द ब्रह्मानन्दसहोदर है। वैज्ञानिक उपलब्धियों में मन की सर्जरी असम्भव है आत्मा का अस्तित्व प्रश्नवाचक है परन्तु प्रेमानुभूति में मन की निर्मलता अनुभवसिध्द है और आत्मिक एहसास ही मुखरित हैं।