इस पुस्तक के लेखक एक ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने बतौर इंजीनियर सिंचाई विभाग में काम करते हुए स्वयं को राष्ट्र सेवा के प्रति समर्पित किया और जब सेवानिवृत्त हुए तो लेखन के माध्यम से समाज को अपने राष्ट्र अपने पूर्वजों और राष्ट्र की संस्कृति से रुबरु कराने का बीड़ा बखूबी उठाया और निभाया। यह पुस्तक उसी दिशा में उठाया गया एक सार्थक प्रयास है क्योंकि जैसे जैसे आप इस किताब के पन्नों को पलटेंगे आप खुद को समाज की उस धुरी के ईर्द गिर्द पाएंगे जहां रिश्ते जिए जाते थे जहां संतों की वाणी लोगों का वचन बन जाया करती थी। सनातन धर्म के सच को खुद में सहेजे हुए है ‘प्रेम रंग उषा’। लेखक ग्रामीण पृष्ठभूमि में संयुक्त परिवार में पले बढ़े हैं यही वजह है कि वे तब और अब के गांवों और समाज के विषय में गहरी और रोचक जानकारी रखते हैं जिसे इस किताब के माध्यम से पाठकों को जानने का अवसर मिलेगा। आज़ादी के बाद किस तरह से देश के तमाम हिस्से बदलते गए अपनी पहचान खोते गए और नई परिभाषा गढ़ते गए साथ ही कैसे ग्रामीण भारत पुरातन संस्कृति से दूर होता गया इन सारी जानकारियों को बेहद रोचक और सधे हुए शब्दों में प्रस्तुत करती है ‘प्रेम रंग उषा’। निश्चित रूप से आने वाली पीढ़ी वीतराग शरणागत तरुणाई लोलुपता नियति नतमस्तक चेतना धर्मशील जांबाज़ नज़रिया तमाशगीर दरस- परस प्रायश्चियत जैसे कई और हिन्दी शब्दों को समझ सकेगी कि हमारे ''जीवन दर्शन'' के लिए ये कितने उपयोगी हैं।
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