किन प्रेतों से मुक्ति का आख्यान है यह कथा या किन प्रेतों की मुक्ति का बयान है? क्या शांंभवी के साथ भी वही होगा जो माधवी के साथ हुआ? क्या यह एक अतीन्द्रिय कथा है जिसमें भूत हैं भूतों जैसे चरित्र हैं? शाहदेव मैंशन दरअसल है क्या? इन सवालों का जवाब ढूंढते हुए यह कहानी और बहुत कुछ कहती है। पितृवंश के दमन और इसके कुचक्र से स्त्रियों के संघर्ष और उनके मुक्ति के स्वप्न की कथा प्रेतों की कथा के साथ साथ चलती रहती है। इसके अलावा हिंसा के विविध रूपों वाह्य और आंतरिक शारीरिक और वैचारिक सब की पड़ताल की कहानी है यह। चर्चित कथाकार पंकज मित्र ने अपने भाषिक कौशल और अविस्मरणीय किस्सागोई से यह कथा संभव की है। कलेवर में छोटी होते हुए भी हमारे समय के बड़े सवालों से रूबरू होती है। भूत प्रेतों की कथा के बहाने पितृसत्तात्मक विचार जातिगत घृणा के प्रेतों से मुक्ति इस कथा का अभीष्ट है। एक बार इस इस कथा को पढ़ना शुरू करते हैं तो यह आपको अपनी गिरफ्त में ले लेती है और हर वक्त आप उत्सुक घुमावदार मोडों से होकर गुज़रते हैं जिनमें आप उलझते है चौंकने है डरते हैं खुश होते हैं दुखी होते हैं । यह दिलचस्प उपन्यासकार हिन्दी में इस जॉनर की कमी को पूरा करने की दिशा में एक कामयाब कोशिश है। पढ़कर देखें शायद निराश नहीं होंगे।
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