बीसवीं सदी दुनिया के इतिहास और भूगोल में कल्पनातीत उथल-पुथल की सदी थी । नये विचारों नये सपनों नये विकल्पों और नये संयोजनों की तलाश में पुरानी दुनिया पुराने ढाँचों पुराने अहंकारों और पुरानी मान्यताओं के टूटने-बिखरने की सदी । नये समाज और नये इन्सान का सपना देखने उस सपने में विचार बारुद पसीने और लहू की जान डालने उस सपने के लड़खड़ा कर गिर पड़ने और फिर से एक नयी दुनिया का सपना जागती आँखों से देखने के हौसले की सदी ।…… …….1960 के दशक से पूँजीवाद ने ‘ट्रांसनेशनल अर्थव्यवस्था’ के दौर में प्रवेश किया: ट्रांसनेशनल कारपोरेट पटिघटना श्रमशक्ति का नया अन्तर्राष्ट्रीय विभाजन और ‘ऑफ शोर फाइनान्स’ के रूप में ‘आवारा पूँजी’ का उदय । इसने ऐसे वैश्विक ट्रांसनेशनल करेन्सी बाजार को जन्म दिया जहाँ अकल्पनीय तेजी के साथ वैश्विक पूँजी प्रवाह का दौर शुरु हुआ । ट्रांसनेशनल करेन्सी ट्रेडिंग मानो एक विशाल ‘वैश्विक कसीनो’ (जुआघर) बन गयी । समाज पर कारपोरेट कब्जे की इस प्रक्रिया में नियमन-नियंत्रण मुक्ति और निजीकरण की नीतियाँ समाज के तीनों मूलभूत स्तंभों को नष्ट करने के लिये आमादा हैं: नागरिक स्पेस; नागरिक अधिकार व आजादी; और रोजगार । नागरिक स्पेस और संस्कृति बाजार मालिकों के हवाले कर दी गयी है । नागरिक अधिकार और आजादी उस ‘फ्रेन्चाइजी’ और औद्योगिक रीइन्जीनियरिंग का शिकार बन चुकी है जिसने सांस्कृतिक रुचियों और चयन को अपनी सनक के दायरे में समेट दिया है । रोजगार पर कारपोरेट हमले का नतीजा बहुराष्ट्रिकों के अपने कामगारों के प्रति किसी भी तरह के सामाजिक-नैतिक दायित्व यहाँ तक कि कामगार रखने के भी दायित्व से मुक्त हो जाने में निकल रहा है ।