जिन दिनों कोरोना का प्रकोप दुनिया भर में फ़ैल रहा था और सभी घर में बैठ गए थे उन दिनों मेरी कविता यात्रा द्रुत गति से चल पड़ी थी। मास्क जरूरी दो गज दूरी घर में रहो जैसे संदेश देना मुझे अति आवश्यक लगा। उन्हीं दिनों सभी की नजर में खलनायक बन गया वो देश जो महामारी प्रसारक बना था उस पर गुस्सा था कि किसी कविता में सामाजिक व्यथा तो में सहभागिता क्यों जरूरी है? खास कर क्वारंटाइन काल क्या है? क्यों घर के भीतर रहना था? एक कविता मिसाल बने शहीद के लिए श्रद्धांजलि थी कि ऐसे समय में जब सब घर में थे तब वे ड्यूटी पर डटे रहे। कर्तव्य परायण की खातिर अपने देश पर कुर्बान हो गए। अखबार घर में रोज आ कर हमें सूचना देते और हिम्मत दुनिया सभी बेहाल हैं। मैंने सोचा कुछ और नहीं तो शब्दों के मोती पिरो कर हर दिन नया हार बना कर अपने आसपास मित्रों को कुछ नवीन साहस के संचार से भर सकूं। मेरी कुछ कविताएं दिन विशेष पर लिखीं गई हैं। ये उन दिनों की यादें है कभी भी भुलाई नहीं जा सकेंगी। इसलिए इसे क्वारंटाइन डायरी का नाम दिया है। पहले भाग में शुरू दिनों की 50 कविताओं को समाहित किया है। ये महामारी के शुरुआती 50 दिनों को समर्पित है। लेखिका सीमा शिवेन्द्र
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