राजा सलहेस मूलतः दुसाधों के लोक देवता हैं लेकिन उन्हें जनपदों में सर्वजातीय श्रद्धा एवं प्रतिष्ठा प्राप्त है। शौर्य और शक्ति के प्रतीक इनकी असीमति वीरता एवं राज्य-प्रशासन की अद्भुत क्षमता से पूर्ण इनकी गाथा ने न सिर्फ लोक-साहित्य बल्कि साहित्य की अनेक विधाओं और संस्कृति के अनेक आयामों को स्पंदित किया है। उपन्यास महाकाव्य नाटक एवं रेडियो नाटक आदि के अलावा इनके गाथायी प्रसंग लोक- मूर्त्तियों लोक-चित्रों नाचों तथा टेलीफिल्म आदि में चित्रांकन रूपांकित है।उपर्युक्त इन सभी सर्वेक्षणात्मक अनुशीलन से राजा सलहेस का राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्वरूप उभरकर सामने आया है जिससे दुसाध जाति के गौरवपूर्ण अतीत एवं राज-काज की अपूर्व क्षमता को नये सिरे से रेखांकित किया गया है। आज आवश्यकता इस बात की है इन्हें ग्राम्य गहवरों से बाहर अभिजात्य प्रतिष्ठा दी जाये जिससे सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय चेतना का विकास होगा। साथ ही भारतीय प्राचीन परम्परा एवं इस देश की पवित्र धरती पर अवतरित लोक देवी- देवताओं के बारे में आने वाली पीढ़ी अपेक्षित जानकारी प्राप्त करेगी। संकलित आलेखों से यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है