: प्रस्तुत पुस्तक अवतारवाद - एक नई दृष्टि आपके हाथों में है | इसे पूरा करने में मुझे लगभग आठ वर्ष लगे | मेरे चिंतन-मनन में यह बात आती रहती थी कि ईश्वर जब निराकार और सर्वशक्तिमान है तो आपदा-निवारण के लिए स्वयं क्यों आता है ? क्यों नहीं वह अपनी शक्ति से अपनी पसंदीदा पवित्र आत्माओं से यह सुकार्य लेता है ? उसमें निराकार और सगुण दो परस्पर विरोधी गुण कैसे हो सकते हैं ? यदि उसके द्वारा लौकिक शरीर धारण करना मान भी लिया जाए तो वह जीव बन जाता है | फिर उसका ईश्वरत्व प्रभावित होता है | इसके बावजूद जब मैं श्रीमद भगवद गीता के चौथे अध्याय का सातवें और आठवें श्लोकों के भावार्थ पढ़ता तो किसी क़दर थोड़ा संतोष करता परन्तु यह सब क्षणिक होता | अंतर्मन देर तक इन भवार्थों पर टिक नहीं पाता | जब मैंने इनका और अधिक अध्ययन एवं अनुशीलन किया तो यह तथ्य उद्घाटित हुआ कि '' अवतार '' शब्द ईश्वर के स्वयं धरती पर आकर मानवता का उद्धार करने के अर्थ में नहीं है अपितु मौलिक रूप में इस अर्थ में है कि ईश्वर अपनी प्रिय और पसंदीदा पवित्र आत्माओं को संकट-निवारण के कार्य पर नियुक्त कर इंसानों को मार्गदर्शन एवं उनकी सहायता करता है | इसी केंद्रीय भाव को लेकर यह पुस्तक लिखी गई है | वास्तविकता का सही भान और प्रकटन हो सके इसलिए इसमें वस्तुनिष्ठ अध्ययन करने का प्रयास किया गया है |