Raniyaa Roti Nahi (Kahani Sangrah)

About The Book

इन कहानियों में सबसे अधिक समाज है क्योंकि अपने समय और समाज से आंख मिला कर उसके रूखे कडुए चुभते सवालों से दो-चार हुए बिना कहानी कहना और सुनना दोनों ही असंभव है और इसके बिना कहानी के शर्मीले पात्र कभी पास भी तो नहीं आते। कानजी और बाबू लेखक को पूस की ठंडी रात में ठिठुरते हुए ही मिलेंगे। सुरसतिया मजदूरों के बर्तन मांजती हुई अपने अनिन्द्य रूप की झलक देकर छुप जाती हुई ही मिलती है। मोनालिसा किसी मित्र की आपबीती से निकलकर गले लग जाती है। हां स्वाति जैसे कुछ पात्र हैं जो सचमुच में अपना पूरा सच आपके सामने खोल देते हैं और अब उस एक पल में लेखक जितना सुन पाए और गाथा लिख पाए ये उसकी सामथ्र्य है। कुल मिलाकर इन कहानियों में रोता-हंसता टूटता-जुड़ता आम इनसान है जो कहीं मैं हूं तो कहीं आप हैं कहीं मोनालिसा है तो कहीं बावड़ी की चुड़ैल है। -डॉ. लक्ष्मी शर्मा
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