एक बार जब पीछे मुड़कर अपनी कहानियों पर विचार करता हूँ तो जहाँ तक मुझे याद आता है मैं स्पष्ट देख पाता हूँ कि घृणा विद्वेष व्यंग्य विद्रूप और दुश्मनी ने मुझे कभी लेखन की प्ररणा नहीं दी। वरन् इसके उलट प्रीति प्रेम सौहार्द्र स्नेह श्रद्धा प्यार-प्रणय पारिवारिक सीमा के भीतर अथवा बाहर विचित्र इंसानी संपर्कों एक से दूसरे के मिलने की दुर्वार आकांक्षा ने बार-बार मुझे लेखन के विषय दिए हैं। इनका दुहराव भी हुआ है। लेइन सब-कुछ जानते हुए भी मैंने इस सीमा का अतिक्रमण कभी नहीं किया। मैंने महसूस किया है कि दुनिया में अनाचार अविचार और अत्याचार का अभाव नहीं है। प्रेम की शक्ति जितनी बड़ी है प्रयोजन के अनुसार घृणा और विद्वेष की शक्ति भी कम नहीं है। बॄहत्तर प्रेम और गंभीरतर कल्याण को रेखांकित करने के लिए इस शक्ति के सहयोग का भी प्रयोजन होता है। जीवन में केवल आलिंगन की ही जरूरत नहीं जो आघात देता है उस पर आघात करना भी जरूरी है। जब तक इंसान में दोनों गुण नहीं होते तब तक जीवन में समॄद्धि नहीं आती और न लेखक की रचना में दीप्ति! इस बात को मैंने अनुभव से जाना है विवेक से विचारा है। उसे केवल कल्पना के रस से सिंचित कर अभिव्यक्त करना नहीं जाना। अपने स्वभाव को समझ अपने रुझान और क्षमता को स्वीकार कर मैंने जीवन-भर केवल प्रेम की कहानियाँ लिखी हैं कोई चाहे तो इसे संकीर्ण अर्थ में प्यार-मुहब्बत कहता है। वैसे है यह प्यार-मुहब्बत ही और कुछ भी नहीं। - नरेंद्रनाथ मित्र