...न जाने क्यों मुझे अपने लिए रेत की नदी का यह प्रतिमान बहुत सटीक लगता है। मैं न जाने कब से सूखी हुई रेत की नदी सी प्रतीक्षारत हूँ कि शायद किसी दिन कोई हिमांशु इस रेत पर अपने कोमल पैरों के निशान बनाता हुआ चलेगा। इस रेत पर वह अपने लिए कोई घरौंदा बनाएगा। घरौंदे के चारों ओर पेड़- पौधे और फूलों की क्यारियाँ बनाएगा। उन पेड़ों की शीतलता और फूलों की महक तपती रेत को शीतल कर देगी और सारे क्षेत्र को उपवन बना देगी। कितनी सुखद कल्पना है किन्तु इस कल्पना से परे मैं अपना जीवन तपती रेत की सूखी नदी सा ही पाती हूँ।-इसी उपन्यास का एक अंशव्यक्ति की युवावस्था के सपने और महत्वाकांक्षाएं उसे मुक्त ऊँचे आकाश में उड़ने के लिए प्रेरित करती हैं किन्तु कभी-कभी ऐसी मुक्त उड़ान उसकी जड़ों का पोषण करने वाले उसके संस्कारों और परम्पराओं के बन्धन से भी उसको मुक्त कर देती है। उपन्यास की नायिका आरती भी ऐसे ही अपनी जड़ों से कटकर एक बन्धन मुक्त आकाश में ऊँचे ऊँचे और ऊँचे विचरने की कामना के साथ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में प्रथम स्थान के साथ सफल होती है; किन्तु जीवन की सांध्य बेला में कोरोना काल की विषम परिस्थितियाँ उसे एक बार फिर अपने उस बीते हुए कल में लौटने को मजबूर कर देती हैं जिन्हें उसने सप्रयास भुला दिया था। तब उसे अपनी खोखली उपलब्धियों और बिखरे अस्तित्व का एहसास कचोटता है। महत्वाकांक्षाओं और संस्कारों के संघर्ष से उपजी एक मर्मस्पर्शी कथा।