ऋष्यशृङ्ग की ऐसी तमाम कविताएँ हैं जो आम जनमानस में पसरे हुये अनीति और आचार को उजागर करती हैं। आम बोलचाल की भाषा में संवाद करती ये कविताएँ उस तिलिस्म तक ले जाती हैं जिसकी पड़ताल कुलीन लोकप्रिय गुट में बँटा हुआ और विचारधारा का पट्टा बाँधकर चलने वाला पेशेवर कवि नहीं कर सकता। कवियों के अपने प्रपंच हैं। अपना संगठन और अपनी चौहद्दी है। वे भी सिस्टम में एक पुर्जे की तरह काम करते हैं जहाँ से उन्हें अनेक सहूलियत प्राप्त होती है। उन्हें प्रकाशित होने और पुरस्कृत होने का भी सरंजाम जुटाना होता है। ऐसे में वे किसी को नाखुश करने का जोखिम नहीं लेना चाहते। इस लिहाज से ऋष्यशृङ्ग ही ऐसा है जो जोड़-तोड़ और तमाम बातों की परवाह न करके सब कुछ उघाड़ कर रख देता है। ख़राब कवि के रूप में ऋष्यशृङ्ग का उदय कोई बड़ी साहित्यिक परिघटना भले न हो लेकिन वह ख़राब को ख़राब कहने का माद्दा जरूर रखता है। जैसे अच्छे को अच्छे की तरह जानने की प्रविधि है उसी तरह ख़राब को ख़राब की तरह समझने का भी एक पैमाना होना चाहिए और इस पैमाने पर ऋष्यशृङ्ग की ख़राब कविताएँ अपने प्रयोग और प्रयोजन में सफल हैं। - अम्बुज पाण्डेय