हिंदी साहित्य के प्रति मेरी रूचि बचपन से ही थी। मैंने 15 वर्ष की उम्र से कविताएं लिखना शुरू किया और बचपन से ही समाज की कुरीतियों के प्रति विद्रोह मेरे अंतर्मन में दबा हुआ है। मेरी कविताएं सामाजिक संघर्ष सामाजिक कुरीतियों और नास्तिकता को परिभाषित करती हैं। वास्तव में ये नास्तिकता ईश्वर को तो मानती है परन्तु ईश्वर से निरंतर द्वन्द को प्रदर्शित करती है। मेरी कविताएं प्रेम में संघर्ष को भी अंकित करती हैं। वर्तमान में मैं एक प्रतिष्ठित कंपनी में सेल्स प्रबंधक के पद पे कार्यरत हूँ और नुमेरोलॉजी के क्षेत्र में भी अग्रसर हूँ।
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