साहित्य हमेशा पराजित के पक्ष में खड़ा होता है। व्यंग्य भी यही काम करता है। इस तरह वह जन सरोकारों से सहज ही जुड़ जाता है। व्यंग्यकार प्रभावी ढंग से जनता की समस्या को उठाने की कोशिश करता है। जन भी उससे जुड़ा हुआ महसूस करता है। यही व्यंग्य की ताकत है। अब मेरा यह दूसरा व्यंग्य संग्रह ‘साहब का बसंत’ आपके हाथों में है। - गोविंद सेन