एक विहंगम दृष्टि डालें तो पाएंगे कि जय शंकर शुक्ल जी ने कहानियों में एक नई दुनिया बल्कि विविधता को गढ़ने की कोशिश की है। इस कहानी बुनने के उपक्रम में गांव के पंच जमींदार आम व्यक्ति आदि की प्रवृतियों को तो पसारते चलते ही हैं साथ ही कहानी में नए कंटेंट का छौंक भी है। वह अपने सपनों का घर हो आपबीती हो अन्यथा हो आदि की रचना सहजता से करते चलते हैं। कहानियों की भाषा परिवेश काल विभाजन विस्थापन आदि को ध्यान में रखते हुए कहानी की दुनिया रची गई है। दूसरे शब्दों में कहें तो कुछ क्षण ऐसे भी आते हैं जब कहानी के विस्तार में एकबारगी महसूस होता है कि अनावश्यक ताना गया है। जहां चाहते और चौकन्ने होते तो कथाकार शुक्ल बच सकते थे। कई जगह पर मैं और मेरा इतना प्रभावी हो गया कि पाठकों को लग सकता है कि इसे कम किया जा सकता है। या फिर इसे छोटा भी रखा जाता तो कहानी अपने आप में मजबूती के साथ अपनी संवेदना प्रकट करने में सक्षम होती। कथाकार शुक्ल जी ही नहीं बल्कि कोई भी लेखक जब लिख रहा होता है तब उसे सब कुछ प्रिय ही लगा करता है। वह चाहे वर्णन हो विस्तार हो या फिर बेहतर लिखने की लालसा में बहुत कुछ लिख जाता है जिससे बचने से भी काम चल सकता है। इसी तरह शुक्ल जी भी कहानियों के विस्तार के वक्त इस ओर ध्यान देते तो बेहतर होता। हालांकि भाषा कथा प्रवाह कथानक और परिवेश एकदम नई जमीन के नहीं हैं लेकिन उसके साथ इनका बरताव नया है। यही नई सोच और घटनाओं को नए सिरे से परोसने की ललक शुक्ल जी को पुरानी जमीन भी नई प्रतीत होती है। यही कारण है कि पुरातन और नवा कथानक को फेंट कर पाठकों से सक्षम रखते हैं।