''सदानीरा'' के ''समकालीन बांग्ला स्त्री कविता'' पर केंद्रित इस विशेष अंक में बांग्ला कविता की एक शैली को उजागर करने का प्रयास किया गया है। यह सोचना अवास्तविक नहीं है कि आने वाले दिनों में बांग्ला कविता की मशाल आधी स्त्रियों के हाथ में और पूरी आकाश में होगी। बीसवीं सदी में बांग्ला कविता में जो स्त्रीवाद मौजूद था वह इक्कीसवीं सदी में पूरी तरह बदल गया है। आज स्त्री-आत्मविश्वास से युक्त जीवन अधिक मुखर है। कविता में भी इसकी झलक दिखती है। पुरुषत्व से बाहर आकर स्त्री-कवियों ने स्वयं के लिए नए विषय निर्मित किए हैं। इस निर्मिति में प्रेम नए रूप में प्रस्तुत हो रहा है। इसके सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक पहलू भी हैं। इसमें दृष्टिकोण-परिवर्तन के बिंदु भी हैं। महज पुरुष-विरोध या पितृसत्ता से मुक्ति अब उसका मुद्दा नहीं है। वह एक खुला आकाश देख रही हैं उसे चुन रही हैं और उसके बारे में रच रही हैं। यह बदलाव 2011 के बाद संभव हुई कविताओं में अधिक आया है। यों बांग्ला स्त्री कविता बदल गई है। इस वजह से बांग्ला कविता में स्त्री कविता की जो शैली प्रचलित थी उसमें भाषा और संरचना की दृष्टि से विचार की एक नई शैली सामने आई है। अब बांग्ला कविता का केंद्रस्थल कोलकाता नहीं रह गया है। नए संचार माध्यमों के आने से नए-नए केंद्र नज़र आने लगे हैं।