Sahityalochan

About The Book

साहित्य पर सबसे महत्त्वपूर्ण प्रभाव साहित्यकार के व्यक्तित्व का पड़ता है। साहित्यकार जो कुछ लिखता है उस पर उसके अनुभव विचारों और मनोभावों की अटल छाप लगी रहती है। वह मनुष्यमात्र की आकांक्षाओं इच्छाओं और भावनाओं को प्रकट करता है किंतु वह सबको अपने ढंग से स्वरूप देकर अपनी रुचि के अनुसार उपस्थित करता है। जहाँ उसने अपने आपको न पहचानकर और अपनी रुचि को दबाकर कृत्रिम स्वर से गाना प्रारंभ किया तुरंत वह अपने पथ से भ्रष्ट हो जाता है और उसकी कृति अपना मूल्य खो बैठती है। साहित्यकार में स्वानुभूति एक अत्यंत आवश्यक गुण है और अनुचित रीति से दूसरे का पदानुगामी होना अक्षम्य दोष है।
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