भारत में जैन स्थापत्य व वास्तुकला की उत्पत्ति हड़प्पा काल से मानी जाती है। स्थापत्य व वास्तुकला के दृष्टिकोण से हड़प्पा संस्कृति विश्व की तत्कालीन संस्कृतियों से काफी ज्यादा परिपक्व थी। ऐसा कहना अत्यंत उचित होगा कि स्थापत्य कला सिर्फ भवनों के निर्माण से संबंधित विद्या नहीं होती है किन्तु यह वास्तुकला विज्ञान से परिपूर्ण होती है तथा जिसमें भवन निर्माण संबंधी सिद्धांतों आदि का विवेचन होता है। भारतीय स्थापत्य एवं वास्तुकला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इतने लंबे समय के बावजूद इसमें एक निरंतरता के दर्शन मिलते हैं। हम गर्व के साथ इस मामले में कह सकते हैं कि जैन संस्कृति भारतीय व अन्य विश्व की तत्कालीन संस्कृतियों से ज्यादा विभिन्न है। जैन वास्तुकला में तत्वों को उनकी सादगी लालित्य और समरूपता और अनुपात पर जोर देने की विशेषता है। वास्तुकला के संबंध में जैनियों ने अपनी शैली विकसित करते हुए वैष्णव और द्रविड़ शैलियों की स्थानीय निर्माण परंपराओं को अपनाया। उत्तम जैन वास्तुकला में गुफाएं मंदिर मठ और अन्य संरचनाएं शामिल हैं। प्राचीन काल में उन्हें चोल पल्लव चालुक्य राष्ट्रकूट और अन्य राज्यों के शासक राजवंशों के तहत महान संरक्षण प्राप्त हुआ।