गहरा है दुख भटक रहा मन यादों के साए में सिहर रहा तन! कोहरे से व्याप्त है सारा गगन क्या करूँ कैसे करूँ आत्म चिंतन उपर्युत्तफ़ पंत्तिफ़यों से ही कवि डॉ- ज्ञान चंद मिश्र स्पष्ट कर देते हैं कि समाज में अनेकानेक विसंगतियाँ भटकन और सख -दुःख स्मृतियाँ किसी को भी विचलित करने के लिए पर्याप्त हैं ऐसे में समाज के लिए साहित्य के माध्यम से अपने स्वर को मुखरित करना दुःसाध्य है। आत्मचिन्तन के निमित्त जो स्थिरता चाहिए वह अदृश्य है। पुस्तक की प्रमुख रचना जो कि संसार के सत्य को उद्घाटित करती है_ चिर सामयिक है-