सारा आधुनिक साहित्य बुनियादी तौर पर आलोचनात्मक साहित्य है। बलराज पांडेय ने बहुत सारी स्थितियों वास्तविकताओं समस्याओं विसंगतियों और विडबंनाओं की अपनी कविता में आलोचना की है। यह आलोचनात्मक चेतना उनकी कविता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है। शब्द और संसार के बीच जो संबंध है उस प्रसंग में बहुत बारीक बातें बलराज पांडेय ने अपनी ''शब्द सीरीज'' वाली कविताओं में की हैं। इनकी कुछ कविताओं को मैं आंदोलनधर्मी कविताएं कहना चाहूंगा। आंदोलनधर्मी दोनों अर्थों में - एक तो किसी आंदोलन से प्रेरणा लेकर लिखी गयी कविताएँ और दूसरी आंदोलन की चेतना जगाने वाली कविताएँ। कविताओं का एक और रूप और पक्ष है - मुक्तिधर्मी कविताएँ जो आंदोलन तो नहीं पैदा करतीं पर पाठकों को अनेक तरह के भ्रमों विकृतियों आदि से चेतना के स्तर पर मुक्त करती हैं। सभी कवि आंदोलनधर्मी हों यह जरूरी नहीं है लेकिन यह जरूरी है कि जो आंदोलनधर्मी न हों वो कम से कम चेतना को बदलने के अर्थ में मुक्तिधर्मी तो हों। बलराज पांडेय के यहां दोनों तरह की कविताएँ हैं। इनकी कविता में कविता का लोकतंत्र मिलता है। इनकी कविता की भाषा बोलचाल के करीब है। यह लोकतंत्र का एक लक्षण है। कविता मनुष्यता की मातृभाषा है। मातृभाषा का सबसे बड़ा गुण है सहजता। अगर कविता में सहजता होगी तभी वह मनुष्यता की मातृभाषा होगी। बलराज पांडेय की कविता में सहजता शुरू से अंत तक है। :: - मैनेजर पांडेय