सिद्धेश्वर मैदान और पहाड़ को जोड़ने वाले कवि हैं। उनकी कविता में नदियों का बहता जल है। वन और वनस्पतियाँ सूर्योदय और सूर्यास्त है। ऋतुएँ हैं। इस जुड़ाव में जहाँ स्मृतियाँ फूल की तरह खिलती हैं वहीं वर्तमान की खड़ी चढ़ाई श्लथ कर देती है। इस यात्रा का अंतहीन होना ही इसे त्रासद बनाता है। रौशनी की तलाश में कवि ऐसी यात्राएँ करते रहे हैं। — अरुण देव