Samdarshi Darshan (Pratham Bhag) Arthik Samta Ka Samikaran


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About The Book

प्रस्तुत पुस्तक समदर्शी दर्शन (प्रथम भाग) आर्थिक समता का समीकरण देश में व्याप्त घोर आर्थिक विषमताओं को नेस्तनाबूद करने का अद्भुत विकल्प प्रस्तुत करती है। साथ ही गरीबी और अमीरी दोनों के समाप्तिकरण की विधाओं का सूत्रपात करते हुए आर्थिक समता संपन्न समाज के निर्माण का मार्ग प्रस्तुत करती है जिससे कि समाज में व्याप्त आर्थिक विषमता और घोर आर्थिक संकट को दूर किया जा सके। प्रस्तुत पुस्तक में लेखक द्वारा एक ऐसे उत्कृष्ट मानव जीवन की परिकल्पना की गई है कि जिसके प्रचलन में आ जाने से मानव समाज बहुत हद तक खुशहाल हो सकता है तथा ‘बहुजन हिताय और बहुत सुखाय’ का प्राकृतिक सिद्धांत धरातल पर आच्छादित होगा।प्रस्तुत पुस्तक में मानव सहित प्राणि मात्र के जीवन के संरक्षण में मानव की क्या भूमिका हो सकती है इसके विभिन्न आयामों पर आवश्यक दृष्टांत प्रस्तुत किया गया है साथ ही मानव जीवन से संबंधित विभिन्न क्षेत्रों पर संक्षिप्त प्रकाश डालते हुए एक आदर्शवादी मानव जीवन की परिकल्पना की गई है जहाँ पर सृष्टि के विभिन्न प्राणियों के अस्तित्व की आवश्यकता को समझते हुए मानव समाज के अधिसंख्य जनों के जीवन को खुशहाली के उत्कर्ष पर पहुंचाने की परिकल्पना लेखक द्वारा इस पुस्तक में की गई है। साथ ही इस पुस्तक में एक ऐसे मानव समाज की परिकल्पना की गई है कि जहाँ पर सभी मनुष्य अपने आपको मानव मात्र के अतरिक्त कुछ भी न समझें। साथ ही इस पुस्तक में समदर्शी दृष्टिकोण वाले मानव समाज की जो परिकल्पना की गई है उसके प्रचलन से मानव समाज में समदर्शी सिद्धांत प्रतिपादित हो सकता है और समान दृष्टिकोण वाले समदर्शी विचारों से ओत-प्रोत समतामूलक समाज की परिकल्पना धरातल पर प्रचलित हो सकती है।
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