‘उपन्यास’ समकालीन साहित्य में सामाजिक चिन्तन को प्रस्तुत करने वाली सबसे सशक्त विधा है। समकालीन हिन्दी उपन्यास साहित्य में सामाजिक चिन्तन की पृष्ठभूमि प्रेमचंद युग में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। प्रेमचंद के सामाजिक उपन्यासों ने पूर्व के तिलिस्मी उपन्यासों की लोकप्रियता के सारे रिकार्ड तोड़ दिये। प्रेमचंद युग से लेकर अब तक उपन्यासों में सामाजिक चिन्तन की धारा अनवरत प्रवाहित है। उपन्यास साहित्य में सामाजिक चिन्तन की इस परम्परा में पुरुषों के साथ-साथ महिला उपन्यासकारों ने भी अपना बहुमूल्य योगदान दिया है। महिला उपन्यासकारों ने जिस संवेदनशीलता और जागरूकता के साथ उपन्यास साहित्य में अपने सामाजिक चिन्तन को सशक्त अभिव्यक्ति प्रदान की वह अभूतपूर्व है। पुरुष उपन्यासकारों की तुलना में महिला उपन्यासकारों का चिन्तन अधिक संवेदनशील है। समकालीन महिला उपन्यासकारों ने न केवल स्त्री अपितु समाज के प्रत्येक शोषित वर्ग को अतिसंवेदनशीलता के साथ अपने चिन्तन का विषय बनाया है। इस वैज्ञानिक और प्रगतिशील आधुनिक भारतीय समाज में आज भी स्त्रियों दलितों और पिछड़ी जनजातियों का एक उपेक्षित वर्ग है। आज भी स्त्रियां रूढ़ियों और प्राचीन संस्कारों में जकड़ी हैं ग्रामीण अंचल विकास के नाम पर अपना मूल सौन्दर्य खोता जा रहा है साथ ही कुछ ऐसे ग्रामीण अंचल भी हैं जहां सामंतवादी संस्कृति पूर्ववत् विद्यमान है और नारी शोषण का शिकार हैं। समकालीन समाज में परिवर्तन के नाम पर केवल शोषकों और शोषितों का रूप बदला है। इन्हीं समकालीन परिस्थितियों को दृष्टिगत करते हुए समकालीन महिला उपन्यासकारों ने अपना महत्वपूर्ण सामाजिक चिन्तन अभिव्यक्त किया है। यह पुस्तक इन ‘समकालीन हिन्दी महिला उपन्यासकारों के सामाजिक चिन्तन’ के स्वरूप को 1975 से 2000 के निश्चित कालखण्ड में रचित प्रमुख उपन्यासों के विवेचन द्वारा विश्लेषित करती है। इसका उद्देश्य यह प्रमाणित करना है कि महिला उपन्यासकारों का लेखन एक वर्ग विशेष ‘स्त्री विमर्श’ तक सीमित न होकर सम्पूर्ण भारतीय समाज की उसी व्यापक चिंतन धारा से अभिप्रेरित है जो वैदिक काल से लेकर प्रेमचंद और प्रेमचंदोत्तर कथा धारा के मूल में व्याप्त है। महिला उपन्यासकारों की युग चेतना भी पुरुष उपन्यासकारों के समकक्ष ही सामाजिक विसंगतियों के प्रति जागरूक चेतना का आवाहन करती है।