हम जी रहे हैं हमारे चारों ओर फैला विराट अस्तित्व जी रहा है लेकिन कभी इस चमत्कार के प्रति हमारे मन में कुतूहल नहीं उठता! कभी-कभी कोई बिरला व्यक्ति इस जगत के प्रति विस्मय भाव से भर उठता है। इसका रहस्य खोलने की जिज्ञासा उसके प्राणों को आग की तरह पकड़ लेती है। और वह अपने को लुटा देता है इस खोज पर।रहस्य खुलता तो नहीं बल्कि और घना होता जाता है। और खोजते-खोजते अंततः खोजने वाला इस रहस्य में इस कदर समा जाता है कि खुद रहस्य बन जाता है।और वह चलता-फिरता रहस्य जब भरे बाजार में आकर सोये हुए लोगों को जगाने लगता है तो नींद से अलसायी आंखें खोलकर वे नाराजगी से देखने की कोशिश करते हैं: कौन है यह? इसे क्या हक है हमें जगाने का? दिखता तो हमारे जैसा है फिर भी बड़ा भिन्न है। लेकिन जहां तर्क हथियार डाल देता है बद्धि का सरज डब जाता है और मन की चिता जलती है उस पार जाकर ओशो रजनीश जैसे सिद्धों की सष्टि शरू होती है। इसलिये अगर सच में ही ओशो रजनीश का परिचय पाना हो तो तत्काल अपने को पहचानने की यात्रा पर निकल पड़ना।