Seva Sadan
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सेवासदन' हिन्दी और शायद उर्दू में भी सबसे पहला सामाजिक उपन्यास है। इस कृति में समाज की अनेक समस्याओं को एक साथ पूर्ण रूप से उभारा गया है। वस्तुतः प्रेमचन्द का सेवासदन एक ऐसा उपन्यास है जिसने उन्हें हिन्दी उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठित किया और समूचे उपन्यास साहित्य को नई दिशा दी।उपन्यास की नायिका सुमन का विवाह एक गरीब व्यक्ति से होता है जो अच्छे वस्त्र और सुविधा सम्पन्न जीवन की उसकी स्वाभाविक इच्छा को पूरा नहीं कर पाता। उसका पिता ईमानदार पुलिस अफसर है। उसके सहयोगी और अधीनस्थ कर्मचारी उससे रुष्ट हैं क्योंकि घूसखोरी आदि कुप्रथाओं का वह विरोध करता है और इस प्रकार उनके पथ का कंटक है। उसे अपनी पुत्री का विवाह करना है इसलिए वह पथभ्रष्ट होता है। उसकी गिरफ्तारी होती है और उसे कारावास मिलता है। रात को एक सखी के घर से लौटने में सुमन को देर हो जाती है। असंतोष और खीज से त्रस्त उसका पति रात में उसे घर से बाहर निकाल देता है। वह अपनी सखी के घर जाने का प्रयत्न करती है परन्तु असफल रहती है। अन्त में उसके पड़ोस में रहने वाली एक वेश्या उसे शरण देती है। सुमन साध्वी नारी के पद से गिरती है। इस प्रकार सेवासदन उस महिला की कहानी है जिसे हालात ने वेश्या बना दिया। समाज में व्याप्त वेश्या समस्या का इसमें विस्तार से चित्रण हुआ है। यह केवल वेश्या समस्या का ताना-बाना नहीं है बल्कि भारतीय नारी की विवश स्थिति और उसके गुलाम जीवन की नियति को बड़े ही मार्मिक ढंग से रेखांकित करने वाली कृति है। About the Author धनपत राय श्रीवास्तव (31 जुलाई 1880 - 8 अक्टूबर 1936) जो प्रेमचंद नाम से जाने जाते हैं वो हिन्दी और उर्दू के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासकार कहानीकार एवं विचारक थे। उन्होंने सेवासदन प्रेमाश्रम रंगभूमि निर्मला गबन कर्मभूमि गोदान आदि लगभग डेढ़ दर्जन उपन्यास तथा कफन पूस की रात पंच परमेश्वर बड़े घर की बेटी बूढ़ी काकी दो बैलों की कथा आदि तीन सौ से अधिक कहानियाँ लिखीं। उनमें से अधिकांश हिन्दी तथा उर्दू दोनों भाषाओं में प्रकाशित हुईं। उन्होंने अपने दौर की सभी प्रमुख उर्दू और हिन्दी पत्रिकाओं जमाना सरस्वती माधुरी मर्यादा चाँद सुधा आदि में लिखा। उन्होंने हिन्दी समाचार पत्र जागरण तथा साहित्यिक पत्रिका हंस का संपादन और प्रकाशन भी किया। इसके लिए उन्होंने सरस्वती प्रेस खरीदा जो बाद में घाटे में रहा और बन्द करना पड़ा। प्रेमचंद फिल्मों की पटकथा लिखने मुंबई आए और लगभग तीन वर्ष तक रहे। जीवन के अंतिम दिनों तक वे साहित्य सृजन में लगे रहे। महाजनी सभ्यता उनका अंतिम निबन्ध साहित्य का उद्देश्य अन्तिम व्याख्यान कफन अन्तिम कहानी गोदान अन्तिम पूर्ण उपन्यास तथा मंगलसूत्र अन्तिम अपूर्ण उपन्यास माना जाता है।
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