प्रस्तावित पुस्तक शहराराबाग यादों के झरोखों से अपने सीमित उद्देश्य के लिए विशेषतया अपने संबंधित परिवार के लिए एक संस्मरण संकलन के रूप में लिखी गई है। वैसे संस्मरणों की अपनी सीमाएं होती हैं क्योंकि इनका सत्यापन कठिन होता है अधिकतर बातें परिवार के बुजुर्गों द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी बताई गई हुई ही होती हैं जिनके दस्तावेजों का मिलना लगभग असंभव होता है। वैसे अगर देखा जाए तो हर एक परिवार छोटा हो या बड़ा हर में कुछ ना कुछ ऐसा होता है जिसपर उस परिवार को गर्व होता है और उनके बुजुर्गों द्वारा वे बातें पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाने और बताने में अच्छा लगता है। बातें जो हमें अपने बुजुर्गों द्वारा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी द्वारा सुनी सुनाई ही जाती हैं क्योंकि उस समय किसी ने इनका कोई दस्तावेज बनाकर भविष्य के सत्यापन के लिए नहीं रख छोड़ा था। कितना अच्छा होता यदि कायस्थों के कुल गुरु महाराज श्री चित्रगुप्त जी की तरह हर परिवार में एक व्यक्ति होता जो अपने परिवार की विशेष बातों का उल्लखित लिपिबद्ध कर सत्यापन का प्रमाण रखता। इस दिशा मे यह पुस्तक अनुपम अनूठा और शायद अपनी तरह का प्रथम प्रयास है जिसके लिए लेखिका बहुत-बहुत बधाई की पात्र हैं। प्रस्तावित पुस्तक का प्रबंधन रूचियों और आवश्यकता अनुसार 4- 5 अध्यायों में किया गया है जैसे परिवार और मोहल्ले के इतिहास की बातों का संकलन संजो कर रखने योग्य परिवारों के वैवाहिक रीति रिवाज परिवार के तीज त्योहारों को मनाने की विधि अपने कुछ व्यक्तिगत संस्मरण अंत में सबसे महत्वपूर्ण अपने इतने बड़े परिवार के मुख्य स्तंभो के अलग-अलग विस्तृत वंश वृक्ष जो शायद नई पीढ़ियों को अपनी जड़ों का विस्तृत ज्ञान सूचना एवं गौरव करने का साधन बने और कुछ उत्सुकता जगा सके।