कहानी लिखना मतलब हर किरदार को खुद के भीतर जीना होता है। ऐसा जीवन जीते-जीते इन किरदारों ने मुझे खुद उनके जैसा सोचने पर विवश कर दिया। इसलिए कहानियों की मूल संवेदना और किरदारों का वैशिष्टड्ढ मेरी आलोचकीय दृष्टि में नहीं समा सका जिस कारण यह अपने मूल रूप में ही विद्यमान रही और उसी रूप में प्रस्तुत भी हुई है। कुछ कहानियां कई सीटिंग में लिखना संभव हुआ जैसे ‘शेष-अशेष’। कहानी ‘शेष-अशेष’ में हर किरदार के अनुसार कहानी प्रस्तुत करनी थी। इसलिए हर खंड में हर किरदार के नजरिए से जो भाव सामने आए वह प्रकट हुए हैं। कुछ कहानी ऐसी रही जो जब तक पूरी नहीं हुई तब तक कलाम को रुकने नहीं दिया जैसे मुत्तिफ़ कहानी। मुक्ति जैसी कहानी मैंने लिखी नहीं बल्कि उसके किरदार ने मेरे ज्ञात संसार में फैले हुए तथ्य से खुद लिखवाया है। इसलिए मुक्ति जैसी कहानियों में मेरा कोई श्रेय नहीं है कि मैंने उन्हें लिखा है बल्कि उन्होंने स्वयं मुझसे लिखवाया है। यह संग्रह मात्र उन भावनाओं की अभिव्यक्ति का शाब्दिक माध्यम है।- डॉ शुभा श्रीवास्तव