SHESH PHIR
Hindi


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About The Book

ख़त ख़लिश और .ख्वाब तीन काल हैं। अतीत वर्तमान और भविष्य के मध्य एक सुरंग बनाने के लिए शब्दों को अंतस में अलग-अलग ढंग से उकेरने के लिए यह पुस्तक उपयोगी हो सकती है। 'शेष फिर' किसी निर्णय या अनुभव को अंतिम नहीं मानती है बल्कि कहे और लिखे गए से इतर बहुत कुछ अनकहा रह गया है इस संभावना को जीवित रखती है। उम्मीद ज़िंदगी की सबसे ख़ूबसूरत शय होती है यह इसी उम्मीद को बचाती है कि तमाम आशंकाओं और हीनताओं के बावजूद कल के लिए हम ख़ुद को बचा पाने में सफल हो जाते हैं। यह पुस्तक प्रश्नवाचक और पूर्णविराम से हटकर जीवन के मनोवैज्ञानिक विस्मय का व्याकरण गढ़ने का एक प्रयास है ताकि हम अँधेरे में वो सब लिख पढ़ सुन सकेंजिसके ज़रिए जीवन आगे बढ़ता है। यह समय के अनुशासन से लगभग मुक्त है इसलिए इसमें संगृहीत ख़तों पर मौसमों की मार नहीं पड़ती है बल्कि इनके ज़रिए मन के उस मौसम का सही पंचांग पता चलता है जो काल गणना में आचार्यों से कहीं छूट गया था।
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