शिक्षा के सवाल जीवन के सवालों से भिन्न नहीं हैं। जीवन को सृजनशील बनाना हो या समाज को शांतिमय और सुन्दर बनाना हो हमें पहले शिक्षा के सवालों को हल करना पड़ेगा क्योंकि जीवन-समाज और श्सिक्षा अन्योन्याश्रित हैं। शिक्षा के सवाल शिक्षा की मौजूदा दशा-दिशा में छुपे हुए हैं। शिक्षा अपने मूल उद्देश्य से भटक गई है। बढ़ते निजीकरण और बाजारीकरण के चलते शिक्षा में सृजनशीलता के अवसर लगातार क्षरित होते जा रहे हैं। वह सामाजिक सरोकारों से दूर होती जा रही है।
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