‘शिक्षा क्या है’ में जीवन से संबंधित युवा मन के पूछे-अनपूछे प्रश्न हैं और जे. कृष्णमूर्ति की दूरदर्शी दृष्टि इन प्रश्नों को मानो भीतर से आलोकित कर देती है पूरा समाधान कर देती है। ये प्रश्न शिक्षा के बारे में हैं मन के बारे में हैं जीवन के बारे में हैं विविध हैं किंतु सब एक दूसरे से जुड़े हैं। ‘‘गंगा बस उतनी नहीं है जो ऊपर-ऊपर हमें नज़र आती है। गंगा तो पूरी की पूरी नदी है शुरू से आखिर तक; जहां से इसका उद्गम होता है उस जगह से वहां तक जहां यह सागर से एक हो जाती है। सिर्फ सतह पर जो पानी दीख रहा है वही गंगा है यह सोचना तो नासमझी होगी। ठीक इसी तरह से हमारे होने में भी कई चीज़ें शामिल हैं और हमारी ईजादें सूझें हमारे अंदाज़े विश्वास पूजा-पाठ मंत्र-ये सब-के-सब तो सतह पर ही हैं। इनकी हमें जांच-परख करनी होगी और तब इनसे मुक्त हो जाना होगा-इन सबसे सिर्फ उन एक या दो विचारों एक या दो विधि-विधानों से ही नहीं जिन्हें हम पसंद नहीं करते।’’