यह एकनिश्छल प्रेम पर आधारित काव्य है। प्रेम के कई रूप होते हैं जैसे इंसान का इंसान के प्रति प्रेम माता-पिता का बच्चों के प्रति प्रेम भक्त का भगवान के प्रति प्रेम नारी का नारी के प्रति प्रेम तथा नारी का पुरुष के प्रति प्रेम। जीवन का एक ही अर्थ है और वह है प्रेम। प्रेम जब अपनी सारी हदें पार कर जाता है तो वह ईश्वर का रूप ले लेता है इसलिए मेरे इस काव्य का शीर्षक है शिव-सा प्रेम। शिव -सा प्रेम करना आसान नहीं है भगवान शिव ने अपने से ऊपर अपने प्रेम से बढ़कर सृष्टि से प्रेम किया।उसके लिए खुद को तपता रहा वियोग में। पार्वती को शक्ति का रूप देना। शिव जी का प्रेम निश्छल है । चाहे वह मनुष्य लोक हो या असुर । उन्होंने सारी सृष्टि के भार को अपने ऊपर ले लिया। जैसे गंगा नदी को जटां में ग्रहण करना सर्प को गले में धारण करना और खुद तपस्वी -सा जीवन जीना । कैलाश पर जाकर बस गए । खुद के लिए कुछ नहीं संजोया। थोड़े से भक्ति से ही भक्तों के दु:खो का अंत कर देते है। इसलिए शिव -सा प्रेम जरूरी है संसार के हित के लिए चाहे वह कोई भी रूप हो धरती का | काव्य का उद्देश्य प्रेम सद्भावना समर्पण सत्यनिष्ठ कर्तव्यनिष्ठ तथा जगत का कल्याणकरना है। संसार को प्रेम से सजाना है। उम्मीद का दामन सदैव थामे आगे बढ़ते रहना है जीवन के प्रति आशावादी दृष्टिकोण बनाए रखना है। आदर्शवाद नैतिकता सम्मान तथा नारी या प्रकृति के अस्तित्व के लिए जागरूक करना ही काव्य का उद्देश्य है- प्रेम के तर्ज पर।
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