शून्य समाधिआज सारी मनुष्यता बीमार है। प्रकृति के चारों तरफ दीवालें उठा दी गई हैं और आदमी उनके भीतर बैठ गया है। और यह आदमियत स्वस्थ नहीं हो सकेगी जब तक कि चारों तरफ उठी हुईं दीवालों को हम गिरा कर प्रकृति से वापस संबंध न बांध सकें। परमात्मा के संबंध सबसे पहले प्रकृति के सान्निध्य के रूप में ही उत्पन्न होते हैं। परमात्मा से सीधा क्या संबंध हो सकता है? सीधा परमात्मा तक क्या पहुंच हो सकती है? उस अनंत पर हमारे क्या हाथ हो सकते हैं? हमारे क्या पैर बढ़ सकते हैं? लेकिन जो निकट है जो चारों तरफ मौजूद है उसके बीच और हमारे बीच की दीवालें तो गिराई जा सकती हैं। उसके बीच और हमारे बीच द्वार तो हो सकता है खुले झरोखे तो हो सकते हैं। लेकिन वे नहीं हैं। और प्रकृति का सान्निध्य कुछ मूल्य पर नहीं मिलता बिलकुल मुफ्त मिलता है। लेकिन हमने वह छोड़ दिया । हमें उसका खयाल नहीं रह गया है। आदमी की पूरी आत्मा इसीलिए रुग्ण हो गई है ।पुस्तक के कुछ मुख्य विषय-बिंदु:• क्या हैं झूठे ज्ञान से मुक्ति के उपाय ?• आनंद का भाव कैसे विकसित हो?• क्या अर्थ है अभेद का ? अद्वैत का? कृतज्ञ कैसे हों ?मैं मृत्यु सिखाता हूंसमाधि में साधक मरता है स्वयं और चूंकि वह स्वयं मृत्यु में प्रवेश करता है वह जान लेता है इस सत्य को कि मैं हूं अलग शरीर है अलग। और एक बार यह पता चल जाए कि मैं हूं अलग मृत्यु समाप्त हो गई। और एक बार यह पता चल जाए कि मैं हूं अलग और जीवन का अनुभव शुरू हो गया। मृत्यु की समाप्ति और जीवन का अनुभव एक ही सीमा पर होते हैं एक ही साथ होते हैं। जीवन को जाना कि मृत्यु गई मृत्यु को जाना कि जीवन हुआ। अगर ठीक से समझें तो ये एक ही चीज को कहने के दो ढंग हैं। ये एक ही दिशा में इंगित करने वाले दो इशारे हैं।-ओशोमृत्यु से अमृत की ओर ले चलने वाली इस पुस्तक के कुछ विषय बिंदु:* मृत्यु और मृत्यु-पार के रहस्य* सजग मृत्यु के प्रयोग* निद्रा स्वप्न सम्मोहन व मूर्च्छा के पार - जागृति* सूक्ष्म शरीर ध्यान व तंत्र-साधना के गुप्त आयामअनुक्रम1: ध्याआयोजित मृत्यु अर्थात न और समाधि के प्रायोगिक रहस्य2: आध्यात्मिक विश्व आंदोलन-ताकि कुछ व्यक्ति प्रबुद्ध हो सकें3: जीवन के मंदिर में द्वार है मृत्यु का4: सजग मृत्यु और जाति-स्मरण के रहस्यों में प्रवेश5: स्व है द्वार-सर्व का6: निद्रा स्वप्न सम्मोहन और मूर्च्छा से जागृति की ओर7: मूर्च्छा में मृत्यु है और जागृति में जीवन8: विचार नहीं वरन् मृत्यु के तथ्य का दर्शन9: मैं मृत्यु सिखाता हूं10: अंधकार से आलोक और मूर्च्छा से परम जागरण की ओर11: संकल्पवान-हो जाता है आत्मवान12: नाटकीय जीवन के प्रति साक्षी चेतना का जागरण13: सूक्ष्म शरीर ध्यान-साधना एवं तंत्र-साधना के कुछ गुप्त आयाम14: धर्म की महायात्रा में स्वयं को दांव पर लगाने का साहस15: संकल्प से साक्षी और साक्षी से आगे तथाता की परम उपलब्धि
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