???? ???? || Shree Radhe

About The Book

<p><strong>About The Book</strong></p><p>जीवन बदलती ऋतुओं का दर्पण है जहाँ प्रत्येक क्षण अपनी विशिष्ट छवि और रंगों में निखरता है l कभी बसंत की मुस्कान से खिला हुआ तों कभी शरद की शीतल &nbsp;पवन के झोंको में बिखरा हुआ l कभी ग्रीष्म की तपन में झुलझता हुआ तों कभी पतझड़ की निरवता में अधूरेपन का अनुभव करता हुआ l फिर होता है वर्षा ऋतू का आगमन -अपने निर्मल जल से हर भ्रम को उलझा कर हर निश्चितता को अपने वेग में बहा ले जाती है l इन बदलते रंगों और ज्वार भाटों के मध्य जीवन अपनी शाश्वत धारा में स्थिर और अटल बना रहता है l<br>हमारे निर्णय जीवन के दिशासूचक होते है -या तों मार्गदर्शक बनकर हमें सही दिशा दिखाते है या फिर हमें पथभ्रष्ट कर विनाश का कारण बनते है वही करुणा विनम्रता संयम और प्रेम से प्रेरित निर्णय हमें धर्म के आलोकित पथ पर अग्रसर करते है जिससे हम अपने जीवन और जगत को प्रकाश से आलोकित करते है l<br>कुछ लोग मुरझाए हुए वृक्ष की भांति अपने भाग्य को असफल मान लेते है तों कुछ बसंत की प्रतीक्षा में अपनी आशाओं को जीवित रखते है l जीवन वास्तव में एक सतत संघर्ष है -चेतना और विस्मृति अच्छाई और बुराई के मध्य l भले ही अच्छाई निराशा की छाया में डगमगाए परंतु अंततः विजय सदैव अच्छाई की होती है l इस संघर्ष की तपीश में ह्रदय के स्वपनो को उद्देश्य की वेदी पर बलिदान देना ही पड़ता है l<br>देवेश की यात्रा राधे से देवेश तक प्रेम वियोग और आत्मिक संघर्षो की ह्रदयविदारक पीड़ा से होकर गुजरती है l क्या मंजीरा की निर्दयता शेष और देवेश के माता -पिता का जीवन छीन लेगी जो स्वार्थ और बलिदान के निरंतर संघर्ष में पिस रहे है ? क्या राधे अपनी श्री- अपनी आत्मा के शाश्वत प्रेम -को त्यागकर देवेश के रूप में अपने भाग्य को स्वीकार करेगा ? क्या बुराई के अंधकार से संघर्ष करता देवेश अपनी मंजिल पा पायेगा ? क्या अपने जीवन के बसंत को पीछे छोड़ चुका राधे पुन: अपने बसंत को आलिंगन कर पायेगा l<br>धर्म की शाश्वत गाथाओं में निहित यह कथा प्रेम त्याग और अच्छाई की बुराई पर विजय का उत्सव है l यह समर्पण और संघर्ष की गहरी और मार्मिक गाथा है जो पाठकों के ह्रदय में गूँजती रहेगी l &nbsp; &nbsp;&nbsp;<br>संघर्ष - प्रश्न और उतर बनकर&nbsp;<br>हमारे ह्रदय में गहराई तक समाहित रहते है &nbsp; <br>फिर क्यों इस सत्य से हम विमुख होते हैं&nbsp;<br>समझ कर भी क्यों अनभिज्ञ बने रहते है &nbsp;?<br>उतर जो हमारे अंतर्मन में जाग्रत है&nbsp;<br>क्यों मौन के बंधन में सिमटा रहता है?&nbsp;</p>
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