Sidhi Saadi Baatein (????-???? ?????)


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About The Book

आज जो बरगद का छायादार पेड़ है वे कभी धरती के गर्भ से फूटा हुआ हरा तिनका था और आज जा यह छलछलाती नदी है वह कभी पहाड़ की छाती से फूटा हुआ झरना था परंतु झरना हो या नदी दोनों का स्वभाव सदा से एक ही रहा-दूसरों के लिए बहते रहना । मैं रमेश अग्रवाल जी को तब से जानता हूं जब व एक लहलहाते पौध के समान आगे बढ़ने की लालसा वाले किशोर थे । जब वे पढ़ने के लिए अपन गांव से हिसार जाया करते थे वापस गांव आते समय हिसार से चाय पत्ती चप्पल-जूते आदि ले आते थे साइकिल पर आसपास के गांव में बेचकर अपनी पढ़ाई और घर के खर्च में सहयोग करत थे । इस तरह ठेठ जमीन से उठे रमेश जी अन्य लड़कों से कुछ विशेष थे । उनके मन में सदैव कुछ बड़ा करने की उमंग रहती थी । आँखों में कुछ अच्छा और संतुष्टि देने वाला काम करने के सपने रहते थे।<br>''परिदों को नहीं दी जाती तालीम उड़ने की वो खुद ही तय करते है मंजिल आसमानों की रखते है हौसला जो आसमां को छूने का उनको नहीं होती परवाह जमाने की।<br>सन् 1977 में उन दिनों मैं हिसार से संघ कार्य के लिए नलवा जाता था। वहीं प्रथम परिचय हुआ रमेश जी से। राष्ट्रकार्य के लिए साइकिल पर आसपास के खानक बालावास रतेरा आदि गांव में जाते थे। युवा रमेश के मन में संघ कार्य करते हुए उमंग जागी कि देश के लिए कुछ किया जाए और वायु सेना में भर्ती हो गए। सन् 1986 में सेना से वापस आते समय लगभग एक लाख रुपया मिला जिसका आधा युद्ध में शहीद जवानों की विधवाओं के लिए दान कर दिया। वास्तव में दान की महिमा समझनी हो तो रमेश जी के व्यक्तित्व से समझी जा सकती है। उनके संवेदनशील और उदार व्यक्तित्व का प्रभाव इतना पड़ा कि उन्होंने जो भी कारोबार किया वह फलता-फूलता गया। लोग उनकी लगन और प्रामाणिकता के आधार पर उन पर भरोसा करते थे। इसी बीच सन् 1987 में उनके एक पूर्व अफसर स्क्वाड्रन लीडर श्री सुभाष गुप्ता डुडीगल (हैदराबाद) से स्थानांतरित हुए तो उन्होंने घर का सामान एअरफोर्स स्टेशन से एअरफोर्स स्टेशन बालासोर (उड़ीसा) ले जाने की समस्या सामने रखी। इन्होंने जिस दक्षता से वह कार्य किया उससे अफसरों के तबादलों पर घर-सामान का स्थानांतरण का काम उन्हीं को सौंपा जाने लगा। यहीं से नींव पड़ी अग्रवाल पैकर्स-मूवर्स की। व्यवसाय के इस काम में सहयोगी बनीं इनकी अर्धांगिनी श्रीमती मंजू अग्रवाल जो आज भी घर चलाने के साथ-साथ अपने बच्चों रितिका एवं नवनीत के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग कर रही हैं। रमेश जी की सफलता का राज उनकी सरलता विनम्रता सच्चाई और सब को साथ लेकर चलने में है। उनका हमेशा यह सोचना कि मैं किसके काम आ सकता हूं। अपने देश-धर्म समाज गांव आस-पड़ोस तथा विशेष रूप से गाय और शिक्षा के प्रति समर्पण उनकी शक्ति है। ''कुछ चलते पगचिन्हों पर कुछ पगचिन्ह बनाते हैं।'' पगचिन्ह बनाने वाले ही वन्दनीय हो जाते हैं।'' मेरी ओर से रमेश जी को यशस्वी और स्वस्थ जीवन के लिए अनन्त शुभकामनाएं!
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