सिंध का गाँधीअंग्रेजों की हुकूमत के खिलाफ स्वाधीनता का आंदोलन मैदानी इलाकों और देश के विभिन्न भागों में कैसे चल रहा थायह हम जानते हैं।लेकिन पहाड़ों और दुर्गम पहाड़ी जंगलो में इसकी क्या शक्ल थी यह नहीं जानते या कम जानते हैं।सरदार पटेल ने मंडी के जिस स्वतन्त्रता सेनानी को गांधी कहा होगा तो यूँ ही नहीं कहा होगा। इसके पीछे उसकी कुर्बानियां थीं। देश की एकता अखंडता और सहिष्णुता की भावना इनकी रग रग में थी। पहाड़ों के सिर आज भी तने हुए हैं तो उन्हीं त्यागों और देश सेवा की भावना के कारण।कथाकार राजी ने कुहासे में आच्छन्न पृष्ठों को हटा कर इन बलिदानियों को सामने लाने का बड़ा काम किया है।उपन्यास ज्ञान वर्द्धक ही नहींपठनीय और रोचक है।मैं गंगाराम जी राजी को सच्चे दिल से बधाई देता हूँ काशीनाथ सिंह