Son Of The Trivenidas Bhagat


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About The Book

कृष्ण कुमार भगत जी की आत्मकथा ‘सन ऑफ दा त्रिवेणीदास’ जीवनी और आत्मकथा विधा के बीच की रचना है। रचना के इस द्वैत या द्वंद्व का कारण यह है कि लेखक के पूरे व्यक्तित्व पर उनके पिता का प्रभाव है। रचनाकार का लेखक रूप जब उसे उस प्रभाव से निकालता है तो आत्मकथा आगे बढ़ती है। आत्मकथा 43 अनुच्छेद में विभत्त है। आत्मकथा का बड़ा हिस्सा परिवार की जटिल स्थिति पिता की रहस्यमय हत्या मां का संघर्ष लेखक का आर्थिक संघर्ष लेखक की रचनात्मक जिजीविषा व साहित्यिक समाज के छोटे अंश पर केंद्रित है। यह आत्मकथा पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि लेखक होना कितना कठिन है। लेखक का जीवन संघर्ष इतना बड़ा है कि सहसा विश्वास करना कठिन हो जाता है कि इस परिस्थिति में भी कोई रचनात्मक लेखन कैसे कर सकता है! कृष्ण कुमार भगत जी ने साफगोई व सहजता के साथ अपने जीवन को व्यवस्थित ढंग से लिख है। हालांकि आत्मकथा चयनित अंश को ही उठाती है।
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