मोनिका स्वतंत्र और स्वच्छन्द विचारों वाली लड़की है। रहीस मां-बाप की बेटी ज्यादा ही लाड़-प्यार में पली है। वह इसी तरह जीना चाहती है। ‘नाइट क्लब’ में नाचना-गाना और शराब के साथ सिगरेट का कश लगाते हुए मौज-मस्ती करने वालों को वह सभ्य और सुसंस्कृत समझती है। वस्त्र तन ढँकने के लिये नहीं बल्कि आधुनिक सभ्यता का दिखावा और एक-दूसरे से ईर्ष्या तथा स्पर्धा में आगे निकल जाना उसे अच्छा लगता है। बड़े-बुजुर्गों से भी हॉय-हॅलो करते हुए आँख और उंगलियों से इशारा करना ही उसकी आदत हो गई है। नीलिमा मध्यम परिवार की ‘लॉ ग्रेजुएट’ और सनातनी संस्कृति में बड़ी हुई युवती है। छोटे-बड़ों का लिहाज करना तथा नमस्कार और हाथ जोड़कर नमस्कार करते हुए बड़े-बूढ़ों का सम्मान करना वह अपना कर्तव्य मानती है। अपने स्वाभाविक व्यवहार और आचरण से एक मिलनसार युवती है नीलिमा। संजय एक उद्योगपति का इकलौता बेटा है। फैक्ट्री का कारोबार देखता है। सरल स्वभाव तथा सनातन संस्कृति पसंद करता है। उसकी माँ सूखाला हाई सोसायटी में पली-बड़ी हुई महिला है। वह संजय की शादी मोनिका से करवाने का निर्णय ले चुकी होती है लेकिन संजय माँ के विचारों से विपरीत है इसलिये वह नीलिमा से माता-पिता को बिना बताये चुपचाप शादी कर घर ले आता है लेकिन उजागर नहीं होने देता कि नीलिमा उसकी पत्नी है। समय बीतता जाता है और नीलिमा एक सच को ढँकने के लिये सौ-सौ झूठ के सहारे से परेशान हो जाती है। एक दिन इनकी शादी की बात संजय की दादी को अनजाने मालूम हो जाती है। संजय के दादा-दादी शुरू से ही नीलिमा को देख आस लगाये रहते हैं कि नीलिमा जैसी ही सुशील और सुन्दर सी उनकी ‘नात-बहू’ होती तो कितना अच्छा होता संजय के जीवन में खुशहाली आ जाती। मोनिका की माँ को इस बात की भनक लग जाती है और वह अपनी सहेली संजय की माँ को अपने पक्ष में कर नीलिमा को घर से निकालने के लिये षड़यंत्र रचकर नीलिमा को क्षति पहुँचाने की चेष्टा करती है लेकिन सफल नहीं हो पाती। नीलिमा अन्याय का डटकर मुकाबला करते हुए संजय के दादा-दादी और पिता का मन जीत लेती है। अंत में मोनिका का वास्तविक रूप समाने आने पर संजय की माँ भी हार जाती है और अपनी भूल स्वीकार कर संजय और नीलिमा को सीने से लगा लेती है।