स्मिता गुप्ता के इस काव्य संग्रह और आपके बीच एक बाधा बनने पर एक अपराध बोध सा हो रहा है। यह इसलिए भी कि कविताओं के पहले गद्य में कुछ बातें कहने की धृष्टता कर रहा। लेकिन इसे मैं एक अवसर के रूप में देख रहा हूं ताकि स्मिता गुप्ता की कविताओं के बहाने बदल रही हिंदी कविता और इसमें स्त्रियों की कविताओं के विषय पर कुछ बातें रख सकूं। दरअसल अब तक मेरे सामने ऐसा कोई पैमाना नहीं आया है जिसके आधार पर गद्य और पद्य के बीच अंतर करते हुए मैं यह कह सकूं कि इनमें अधिक असरदार कौन है। खासकर स्मिता गुप्ता की कविताओं को पढ़ते हुए मैंने यह और भी महसूस किया। मन थोड़ी देर के लिए छायावादी युग में जरूर चला गया लेकिन जल्द ही वह इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में लौट आया और यह देखने लगा कि एक स्त्री गंडक नदी की चिंता कर रही है। वह नदी जिसकी कछार पर उसका बचपन बीता उसने अपनी किशोरावस्था को जीया और सामाजिक रस्म-रिवाजों के अनुसार अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए संवासिन की तरह बार-बार गंडक के किनारे लौट जाती है। लेकिन जरा ठहरिए। यह स्त्री की सीमा नहीं है। स्त्री गंडक से केवल अपने सरोकारों को नहीं जोड़ती। वह कुछ और दृश्य भी उकेरती है।---नवल किशोर कुमार