कविता हृदय है। नदी का नाद है। तन-मन का संगीत है। भावों की त्रिवेणी है। मन का उद्गम है। यह जीवन का रस है। रस की अभिव्यक्ति है। सरस्वती का वरदान है तो शिव का प्रताप है। कविता लिखी नहीं जाती। न ही कही जाती है। कविता तो दिल से निकलती है और दिलों तक पहुंचती है। कविता परोपकारी है। परहितकारी है। साहित्य वह है जो सबका हित करे। रस वह है जो काव्य का रसपान करे। आमतौर पर माना जाता है कि छंदों में ही गति लय और ताल होती है। लेकिन अतुकांत कविताएं भी बोलती हैं।भावों की बर्फ जब पिघलती है तो उसके कई रूप होते हैं। वह कहीं जल बनती है तो कहीं जीवन। ऐसा ही कुछ कविता के बारे में भी कहा जा सकता है। छंद व्याकरण के अपने रूप हैं। मुक्त छंद के अपने रूप। रिश्ता एक है-भाव। हृदय-उदगार। इन भावों को पिरोने का एक प्रयासभर है-मेरा पहला काव्य संग्रह...सूर्याक्षर।शब्द और अक्षर में जो महीन अंतर होता है वही अंतर इसी में है। यह मेरा प्रारंभिक चरण है। हर किसी का प्रारंभ शायद ऐसा ही होता होगा। जब किसी नदी का उद्गम होता है जो छोटी सी धारा के रूप में होता है। वही नदी बाद में विस्तार लेती है और अंत में सागर में मिल जाती है। मेरी कविताएं भी एक छोटी धारा है बस। भावों की धारा। आत्मसंतुष्टि की धारा। जो परमपिता परमात्मा और मां सरस्वती ने लिखवा दिया लिख दिया। इनको मैंने किसी बंधन में नहीं बांधा। बंधन में बांध भी नहीं सकता था। बंधन में गुरु हनुमानजी भी नहीं बंधे। उनके प्रताप से मेरी कविताएं भी नहीं बंधीं।
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