लखनऊ निवासी कवयित्री शालिनी सिंह सूर्य द्वारा रचित उत्कर्ष प्रकाशन द्वारा प्रकाशित शालिनी सिंह की यह दूसरी पुस्तक है इससे पूर्व इनकी प्रथम पुस्तक बैलगाड़ी पिछले वर्ष प्रकाशित हो चुकी है .................................................. प्रस्तुत काव्य कृति ‘सूर्यसुता’ नारी शक्ति के विविध रूपों को दर्शाती नारी पीड़ा की व्यथा-कथा कहती नारी के अहसासों को व्यक्त करती एक अद्भत पुस्तक बन पड़ी है। जो सच में इक नारी के जज्बातों को बयां करते हुए जहां एक तरफ सीख देती प्रतीत होती है वहीं इसे इक विडम्बना भी कहती नजर आती है। सत्य ही है छोटी-छोटी काव्य क्षणिकाएं कई बार बहुत कुछ कह जाती हैं और समझने वाले बखूबी समझ भी लेते हैं। कविता कहने लिखने से मन हल्का होता है जो जीवन जीने में मददगार साबित होता है। इस काव्य पुस्तक में कवयित्री शालिनी सिंह ‘सूर्य’ ने जैसे अपनी आपबीती लिख डाली हो अपने संस्मरण काव्य रूप में प्रस्तुत किये हों ऐसा सहज ही आभास होता है। इनकी रचनाओं में प्रेमरस भी घुला है तो विरह की टीस भी उभर कर नृत्य करने लग जाती है। समाज की परख रखने वाली कवयित्री शालिनी जी ने कई रचनाओं में ऐसे उल्लेख दिये हैं जिन्हें पढ़कर उनके बुद्धिजीवी होने के संकेत मिलते हैं।
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