Swang
shared
This Book is Out of Stock!

About The Book

स्वाँग कभी एक बेहद लोकप्रिय लोकनाट्य विधा रही है बुंदेलखंड की। नाटक नौटंकी रामलीला से थोड़ी इतर। न मंच न परदा न ही कोई विशेष वेशभूषा। बस अभिनय।  स्वाँग का मज़ा इसके असल जैसा लगने में है। एकदम असली गोकि वहाँ सब नकली होता है : नकली राजा नकली सिपाही नकली कोड़े नकली जेल नकली साधु काठ की तलवार नकली दुश्मन और नकली लड़ाइयाँ। नकली नायक नकली खलनायक। वही नायक वही खलनायक। सब जानते हैं कि अभिनय है नकली है सब नाटक है यह; पर उस पल वह कितना जीवंत प्रतीत होता है। एकदम असल। लोकनाट्य तो ख़ैर समय के साथ डूब गए। अब बुंदेलखंड के गाँवों में स्वाँग नहीं खेला जाता। परन्तु हुआ यह है कि अब मानो पूरा समाज ही स्वाँग खेलने में मुब्तिला हो गया है। सामाजिक राजनीतिक न्याय और कानून इनकी व्यवस्था का सारा तंत्र ही एक विराट स्वाँग में बदल गया है। यह न केवल बुंदेलखंड के बल्कि हिंदुस्तान के समूचे तंत्र के एक विराट स्वाँग में तब्दील हो जाने की कहानी है।
Piracy-free
Piracy-free
Assured Quality
Assured Quality
Secure Transactions
Secure Transactions
*COD & Shipping Charges may apply on certain items.
Review final details at checkout.
358
499
28% OFF
Paperback
Out Of Stock
All inclusive*
downArrow

Details


LOOKING TO PLACE A BULK ORDER?CLICK HERE