SWAPNA VIKALP AUR MARG

About The Book

किसी दल या व्यक्ति की सरकार अगर स्थायी हो जाती हैं तो ये लोकतंत्र को कमजोर करती हैं। नीकरशाही स्थाई सरकार से भयभीत होकर विल्कुल ही गुलाम बन जाती है। अपने संवैधानिक कानून के पालन के दायित्व को भूल जाती है और व्यक्ति तथा सत्ता का आदेश ही उसके लिये कानून व अंतिम वन जाता है फिर नौकरशाही को सेवानिवृत्ति के बाद अफसर या सेवा काल में मलाईदार पद का लोभ भी कर्तव्यच्युक्त करता है तथा सरकारें उसे कुसी दिखाकर ललचाती हैं। सरकारें भी सत्ता के मद में निरंकुश हो जाती हैं और लोकतंत्र का क्षय हो जाता है। स्थायी सरकारें विपक्ष जनता और मीडिया की आवाज को सुनना तो दूर उन्हें इतना दबा देती हैं कि उनका गला ही घुट जाये। इसलिये डॉ. लोहिया कहते थे कि सरकारों को रोटी की तरह उलटते पलटते रहना चाहियेष अगर रोटी एक ही तरफ पड़ी रहेगी तो जल जायेगी। इस आधार पर भी मैं चाहता हूँ कि वर्तमान सरकार बदले ताकि लोकतंत्र की रोटी वेस्वाद न हो सके। द्विज मानसिकता का मतलब होता है विषमता की व्यवस्था और हमें यह भी नहीं भूलना हैं कि जव पिछड़ी जातियों के लोग अतीत का हवाला देकर अगड़ों के खिलाफ घृणा या भेदभाव की भाषा का इस्तेमाल करते हैं तब वे पिछड़े न रहकर द्विज बन जाते हैं। पिछड़े वर्ग का आंदोलन समता का आंदोलन है और ऐसा हर आंदोलन जो विषमता आधरित होगा उसे करने वाला चहि वह अंगड़ा हो या पिछड़ा वह ब्राह्मणवादी मानसिकता का होगा। हम अक्सर यह देखते हैं कि पिछड़ी जातियों में सम्पन्न लोग भी अपने निजी जीवन में द्विजों के तरीकों का अनुसरण करते हैं। हमें बड़े बनने की ललक छोड़कर बराबरी पैदा करनी होगी। बड़ों के नकलची बनने की बजाय गरीवों से एकाकार होना पड़ेगा और यही लोहिया की दृष्टि थी।
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