जीवन सरल भी है और कठिन भी। यह कभी फूलों की सेज लगता है तो कभी काँटों का बिछौना। परिस्थितियाँ कब कौन-सा रूप ले लें इसका कोई भरोसा नहीं। वे न तो पूर्व सूचना देती हैं न ही पूर्वानुमान स्वीकार करती हैं। ऐसे में मन ही वह केंद्र होता है जो कभी शांत साधु की तरह निर्विकार हो उठता है तो कभी शरारती बालक-सा चंचल हो जाता है। निर्णय भी वही लेता हैै। ‘लेखन का विषय स्वर शैली’ सब कुछ उसी की प्रेरणा से आकार लेते हैं।मैंने लिऽना तब शुरू किया जब शब्दों ने भीतर बोलना शुरू किया। कोई तय योजना नहीं कोई निश्चित विषय नहीं। बस जब अंतरतम की तूलिका चल पड़ी तो पृष्ठ पर भावों की आकृतियाँ बनने लगीं। कविता संस्मरण विचार या व्यंग्य। यह सब मन की प्रकृति पर निर्भर रहा। कई बार तो लगता है जैसे मैं नहीं लिखता। मेरा मन ही चुपचाप बिना अनुमति माँगे शब्दों को पंक्तियों में गूँथ देता है।...डॉ राजेश कुमार सिंघई