Tajmahal Ka Tender


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About The Book

À¤¤à¤¾à¤œà¤®à¤¹à¤² का à¤ÿेंडर' हिंदी का ऐसा मड़लिक नाà¤ÿक है जिसने सफल मंचनों के नए कीर्तिमान गढ़े। संस्कृत, अंग्रेजी और अन्य भाषाओं से अनूदित-रूपांतरित नाà¤ÿकों पर निर्भर रहनेवाले हिंदी रंगमंच के पास हिंदी के अपने मड़लिक नाà¤ÿक इतने कम हैं कि उँगलियों पर गिने जा सकते हैं। उनमें भी मंचीयता के गुणों से संपन्न नाà¤ÿक तो और भी कम हैं। ऐसे में ताजमहल का à¤ÿेंडर एक राहत की तरह मंच पर उतरा था और आज वह अनेक नाà¤ÿक-मंडलियों की प्रिय नाà¤ÿ्य-कृतियों में है, दर्शकों को तो $खैर वह भुलाए ही नहीं भूलता। देश-विदेश की अनेक भाषाओं में इसका अनुवाद और मंचन हो चुका है, और हो रहा है। नाà¤ÿक का आधार यह परिकल्पना है कि मुगल बादशाह शाहजहाँ इतिहास से निकलकर अचानक बीसवीं सदी की दिल्ली में गद्दीनशीन हो जाते हैं, और अपनी बे$गम की याद में ताजमहल बनवाने की इच्छा ज़ाहिर करते हैं। नाà¤ÿक में बादशाह के अलावा बा$की सब आज का है। सारी सरकारी मशीनरी, नड़करशाही, छुà¤ÿभैये नेता, किस्म-किस्म के घूसखोर और एक-एक फाइल को बरसों तक दाबे रखनेवाले अलग-अलग आकारों के क्लर्क, छोà¤ÿे-बड़े अफसर, और एक गुप्ता जी जिनकी देख-रेख में यह प्रोजेक्à¤ÿ पूरा होना है। सारे ताम-झाम के साथ सारा अमला लगता है और देखते-देखते पच्चीस साल गुज़र जाते हैं। अधेड़ बादशाह बूढ़े होकर बिस्तर से लग जाते हैं और जिस दिन ताजमहल का à¤ÿेंडर फ्लोà¤ÿ होने जा रहा है, दुनिया को विदा कह जाते हैं। नाà¤ÿक का व्यंग्य हमारे आज के तंत्र पर है। बीच-बीच में जब हम इसे बादशाह की निगाहों से, उनके अपने दड़र की चँचाई से देखते हैं, वह और भी भयावह लगता है, और ताबड़तोड़ कहकहों के बीच भी हम उस अवसाद से अछूते नहीं रह पाते जिसे यह नाà¤ÿक रेखांकित करना चाहता है यानी स्वार्थ की व्यक्तिगत दीवालियों के बीच पसरा वह सार्वजनिक अंधकार जिसे आज़ादी के बाद के भारत की नड़करशाही ने रचा है।
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