संविधान सभा में विचार किया गया था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्यापक लोकहित सुनिश्चित करने हेतु संस्थाओं की स्वायत्तता सबसे महत्वपूर्ण कारक होगी ताकि संस्थाएँ सम्भावित तानाशाही पूर्ण राजनीतिक दबाव और मनमानेपन से बचकर जनहित कारी नीतियाँ बनाकर पेशेवराना तरीक़ों से लागू कर सकें। इसीलिए भारतीय स्टेट बैंक का निर्माण करते समय सम्बंधित अधिनियम में संस्था को स्वायत्त बनाए रखने की व्यवस्था की गई थी। तलवार साहब की अध्यक्षता में स्टेट बैंक ने स्वायत्तता पूर्वक संचालन से लाभ में दस से बीस प्रतिशत प्रतिवर्ष की वृद्धि दर्ज की थी। उनके कार्यकाल के दौरान शाखाओं की संख्या जो 1921 में इंपीरियल बैंक बनाते समय से 1969 तक 48 वर्षों में मात्र 1800 थी जो सिर्फ़ 07 सालों (1969-1976) में बढ़कर 4000 हो गई। तलवार साहब ने भारतीय दर्शन के रहस्यवादी आध्यात्म की परम्परा को अपने जीवन में उतारकर सिद्धांत आधारित प्रबन्धन तरीक़ों से प्रशासकों की एक ऐसी समर्पित टीम बनाई जिसने स्टेट बैंक को कई मानकों पर विश्व स्तरीय संस्था बनाने में सबसे उत्तम योगदान दिया। ऐसे निष्काम कर्मयोगी के कार्य जीवन की कहानी की यह किताब आपके हाथों में है। जो आपको यह बताएगी कि मूल्यों से समझौता किए बग़ैर सफल सुखद और शांत जीवन यात्रा कैसे तय की जा सकती है।