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About The Book
Description
Author
जो सरकारी तंत्र में हैं जो इस तंत्र का हिस्सा बनना चाहते हैं जिनका इस तंत्र से सामना होता है के लिए ये जरूरी उपन्यास है। उन सभी के लिए भी ये जरूरी उपन्यास है जो इस राष्ट्र को विकसित होते देखना चाहते हैं। देश के विकास का इंजन प्रशासन तंत्र होता है और हरेक जागरूक नागरिक को इस इंजन के भीतर क्या चल रहा है मालूम होना ही चाहिए। लेखक की कलम इस तंत्र की भीतरी सच्चाइयों को निर्ममता से उघाड़ती जाती है और पाठक के बहुत से भ्रम दूर होते चले जाते हैं। सरकारी अधिकारियों और राजनीतिक नेताओं का गठजोड़। सरकारी कार्यालयों का चापलूसी भरा माहौल जो आम जनता के लिए संवेदनहीनता की हद तक कठोर है। रेस्ट हाउस पर ठहरने वाले अतिथियों के खाने-पीने का खर्चा उठाने की समस्या। सरकारी अधिकारियों के दौरों में सरकारी काम और व्यक्तिगत कामों का संतुलन। अफसर के साहित्यकार होने पर रसूख का प्रयोग अपने साहित्य के प्रचार के लिए करना। सफल अधिकारी माने जाने में चापलूसी और जुगाड़ का महत्व। शासकीय बैठकों का माहौल जिनमें पिलाई गई चाय का खर्च अक्सर मेहमानों को उठाना पड़ता है। तहसील कार्यालय में इस्तेमाल हो रही प्राचीन भाषा। अधिकारियों के अपने-अपने चाटुकार मंडल। कार्यालयों में व्याप्त जातिवाद। बड़े अधिकारियों के अंधविश्वास। अधिकांश सरकारी कर्मचारियों द्वारा भ्रष्टाचार को आवश्यक बुराई मानना। निलंबित सरकारी अधिकारी का अकेलापन। रिटायरमेंट के बाद अपने ही साथियों से मिलने वाली घोर उपेक्षा। आदि बातों का भावपूर्ण विवरण इस उपन्यास में विनोदपूर्ण व्यंग्यात्मक चुटीली भाषा में किया गया है। ये भाषा कभी हँसाती है कभी चिकोटी काटती है। उपन्यास के नायक उपआयुक्त ‘जोशी’ की कहानी के साथ पाठक प्रशासन तंत्र के भीतरी हालचाल को आश्चर्य से देखता जाता है। अन्त में तंत्र का निर्मम और संवेदनहीन चेहरा स्पष्ट रूप से दिखाई देकर सोचने के लिए विवश करता हुआ विलीन हो जाता है।